अबे मोबाइल है कि नेता

तरह-तरह के आइटम आ लिये हैं, साहब। मोबाइल फोन में टीवी, वीडियो, इंटरनेट, फास्ट डाटा ट्रांसफर, ना जाने क्या। कीमत सिर्फ सत्तर हजार रुपये।
हर आइटम को अलग अलग रहने दिया जाये। टीवी टीवी रहे, फोन फोन। पर ऐसा हो कहां पा रहा है जी, कोई क्या है, समझ में कहां आता है। जो इधर हमारी हेल्थ के लिए, हमारी फैमिली के लिए बहुत चिंतित दिखता है, वह इंश्योरेंस का एजेंट सेल्समैन निकलता है। फोन पर चहकती हुई बालिका जो मुझे बर्थ डे की शुभकामना देती है, अगली ही सांस में बताती है कि आप बूढ़े हो रहे हैं, आपके लिए नया इंश्योरेंस प्लान यह है।

जिसे जो समझो ,वह वह नहीं है। जो काम जहां होना चाहिए, वहां नहीं होता।
बंदा घर में होम थियेटर लगाकर फिल्म देखता है, और सिनेमा हाल के माल में खाना खाने जाता है। तरह तरह के संयंत्र, दवाईयों से घर को अस्पताल बनाकर रखता है और फाइव स्टार प्राइवेट अस्पतालों के नीचे बने रेस्त्रां में खाना खाने जाता है। दिल्ली के एक टाप अस्पताल के रेस्त्रां की चाट बहुत फेमस है। इलाज के मामले में यह अस्पताल अभी ज्यादा नाम नहीं कमा पाया है। अब बंदा घर में वीरानी, तूरानी, और ना जाने किन किन फैमिलियों के मसलों पर चिंतित होता है। और बीबी दफ्तर में भी मोबाइल पर बात करना चाहे, तो कह देता है कि अभी घरेलू मसलों के लिए टाइम नहीं है।
जो आइटम जहां का है, वहां नहीं है। पता नहीं कहां कहां है।

लेटेस्ट मोबाइल का सेल्समैन बता रहा है कि इस मोबाइल के जरिये आप एकदम फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन भेज सकते हैं। आपको फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन मिल सकती है।
अब फास्ट इनफोर्मेशन मिल भी जाये, तो क्या फर्क पड़ता है।
आलू बीस प्रतिशत महंगे हो गये। यह इनफोर्मेशन अभी मिल जाये, या कल सुबह मिल जाये, क्या फर्क पड़ता है। बल्कि कल सुबह ही मिले, तो बेहतर, एक रात की नींद गायब तो नहीं होगी। और जिन इनफोर्मेशनों के लिए दिल बेकरार रहता है, वो अब कहीं से नहीं आती। मसलन चावल पांच रुपये किलो कहां मिल सकते हैं, कोई नहीं बताता। आलू दो रुपये किलो कहां बिकते हैं, यह इनफोर्मेशन कहीं से नहीं आती।

अबे फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन का क्या करेंगे, आलू टमाटर सस्ते होने की इनफोर्मेशन ला ना।
सरजी वो इनफोर्मेशन हमारे पास भी नहीं है-मोबाइल का सेल्समैन बता रहा है।
तब क्या खाक टेकनोलोजी डेवलप हुई है।

ऐसा मिक्सममिक्स कर दिया है कि समझ नहीं आता कि आइटम है क्या। उधर से देखो, तो मोबाइल, इधऱ से देखो, तो कैमरा, उधर से देखो, वीडियो, इधर से देखो रेडियो, अबे तुझे क्या कह बुलायें। क्या है तू, असल में तुझे क्या मानें। तू टेकनीकल डिवाइज है या नेता, कुछ पक्का ही नहीं है कि तू है क्या।
इधर से देखो, तो भाजपाई लगता है, उधऱ से देखो तो कांग्रेसी लगता है। उधर से देखो, वहां भी उठक बैठक है, इधर से देखो, तो यहां भी आमदरफ्त है।

होना तो यह चाहिए कि नेताओँ का कैरेक्टर टेकनीकल डिवाइजों के लेवल पर आता, एकदम स्पेसिफिक माफिक, कोई कनफ्यूजन नहीं है। जो है, एक झटके में साफ, सामने।
पर हो गया उलटा, टेकनीकल डिवाइजों का लेवल नेताओँ के लेवल पर आ लिया है। समझ में ही नहीं आ रहा है कि असल में है क्या। एकैदम शिबू सोरेन के माफिक दिखायी पड़ रहे हैं बड़के बड़के मोबाइल कम टीवी कम कैमरा कम इंटरनेट कम जाने क्या क्या।

बल्कि मैं तो अब डर रहा हूं। मोबाइल फोन में टीवी आ गया है, क्या पता कुछ दिनों बाद किसी टीवी में मोबाइल फोन आ जाये। बड़ा कनफ्यूजन हो जायेगा, आवाज कहां से आ रही है, टीवी सीरियल से आ रही है या फोन। हो सकता है कि कुछ इस टाइप का सीन बने टीवी कम फोन में-
हलो मैं अलां नेता बोल रहा हूं।
आज रात को नौ बजे घर में घुसेगा, आपका माल पार कर लेगा।
मिलना है।
खौफ का खलीफा बचकर रहना। वह हाथ साफ कर लेता है।
वोट मुझे दीजिये।
नोट भी, जेवर भी, घऱ के सारे माल को गायब कर देता है। खौफ का राज देखिये, रात ग्यारह बजे।
देखेंगे भई, देखेंगे, अभी तो बहुत कुछ देखना लिखा है हमारी किस्मत में।

ओलंपिक पर सर्वदलीय

ओलंपिक पर हुई एक गुप्त सर्वदलीय बैठक में यह खाकसार एंट्री ले गया था। वहां हुई चर्चा इस प्रकार है।
सर्वदलीय बैठक का संचालक-देखिये, हम ओलंपिक से जुड़े मसलों पर कुछ करने के लिए यहां आये हैं। और शरद पवारजी आप नोट मत लहराइये, बीसीसीआई की अमीरी का पता सबको है। और लेफ्ट के नेताओं से अनुरोध है कि वो रुम के बाहर ना बैठें। यहां कोई बाहर से सपोर्ट या अपोज करने की बात नहीं हैं। सब अंदर आ जायें। शिवराजजी पाटिलजी, आप यह बयान क्यों दे रहे हैं कि हम धमाकों की निंदा करते हैं। आपको खबर ही नहीं है, आज कहीं धमाके नहीं हुए हैं। आप रोज सुबह उठते ही बयान दे देते हैं, इससे कनफ्यूजन फैल जाता है। बयानों में इत्ता रेगुलर ना हों, धमाके इतने रेगुलर नहीं हैं। बीच में एकाध हफ्ते नहीं भी होते धमाके।

खैर लेफ्ट वालों ने साफ कर दिया कि वह रुम के अंदर नही आयेंगे, बाहर से ही सपोर्ट या अपोज करेंगे, समय समय पर। कब क्या करेंगे, कुछ पक्का नहीं है।
संचालक-हां तो प्लीज शरद पवारजी आप बोलें।
शरद पवार-मैं पच्चीस करोड़ रुपये हर खेल के पदक विजेता को देने का ऐलान करना की सोच रहा था। पर यहां आकर याद आया कि क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की पहली जिम्मेदारी क्रिकेट को आगे बढ़ाने की है। श्रीलंका की टेस्ट सीरिज में हमारी जैसी पिटाई हुई है, उसे देखते हुए मैं सारी रकम क्रिकेट खिलाड़ियों को देने की घोषणा करता हूं, ताकि वो सिर्फ खेल पर ध्यान लगायें।

इस पर भाजपा के कुछ नेतागण उठकर हल्ला मचाने लगे-राम सेतु, राम सेतु।
संचालक-पर यह तो बताइए, राम सेतु का क्या रिश्ता खेलों से है।
एक कार्यकर्ता –जो भी प्लेयर श्रीलंका में ढंग से नहीं खेला है, उसे राम सेतु से धक्का दे दो। स्विमिंग करके पार जायेगा, इस चक्कर में कुछ स्विमिंग सीख जायेगा। अगली बार सौरभ गांगुली को ओलंपिक स्विमिंग में भेज दो। सौरभ सारे मैच क्रिकेट के ही क्यों हरवायें, कुछ स्विमिंग वाले भी उन्हे झेलें।

संचालक-हां होम मिनिस्टर पाटिलजी आप बोलिये ना।
पाटिलजी-मैं निंदा करता हूं।
संचालक-जी धमाके नहीं हुए हैं। आप प्लीज रोज का बयान ना दें।
पर तब पाटिलजी सो चुके थे।

अब समाजवादी पार्टी की बारी थी।
समाजवादी पार्टी के नेता-हम अमर सिंहजी से रिक्वेस्ट करके हम कुछ फिल्म स्टारों को ओलंपिक गेम्स की ओर उन्मुख कर सकते हैं। बिपाशाजी जी से रिक्वेस्ट कर सकते हैं। देखिये मसला हार का नहीं है, स्विमिंग में जैसे और हारे हैं, वैसे ही बिपाशाजी भी हार जायेगी। पर पब्लिक का इंटरेस्ट तो बढ़ेगा, ऐसे ओलंपिक गेम्स का भला होगा।
खैरजी, मैं तो अभी से अगले ओलंपिक गेम्स का इंतजार कर रहा हूं, जब कैटरीना कैफजी भारतीय स्विमिंग टीम का नेतृत्व कर रही होंगी।

कलंदर का कमाल

कुछ लोग काम करके देश का हित करते हैं।
कुछ लोग देश का हित तब करते हैं, जब वो काम ना करें। नेता दूसरी कैटेगरी में आते हैं। मुशर्रफजी के आखिरी भाषण में जब उन्होने कहा कि देश के लिए , अवाम के लिए मेरा दिल रोता है। तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि वह नेता हो लिये हैं।

नेता ही रोना अफोर्ड कर सकता है।
आम अवाम के पास रोने की लग्जरी के लिए टाइम नहीं है। वह तो झोला लिये सस्ते आलू टमाटर तलाशता है या फिर और ज्यादा काम तलाशता है, ताकि महंगे आलू का मुकाबला कर सके।
पालिटिक्स भी अजब खेल है साहब, कल तक जो बंदा मुल्क का मालिक था, आज अतीत की धरोहर टाइप हो लिया। धरोहर भी ऐसी,जिसे बाकी रखने को तैयार ना हों।

खैर, अब मुशर्रफ के जाने के बाद आफत बचे नेताओं के लिए आने वाली है कि अब पाकिस्तान के चौपटीकरण के लिए किसे जिम्मेदार ठहरायेंगे। यूं यह अलग बात है कि पाकिस्तान के ज्यादातर नेता चौपटीकरण के मामले में आत्मनिर्भर हैं। अब लोकतंत्र के तबाह होने की और वजहें तलाशनी पड़ेंगी, नवाज शरीफ साहब और जरदारी साहब को छोड़कर।

मुशर्रफ साहब इंडिया आ जायें, बहुत काम है यहां।
मेरी राय में उन्हे क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का एडवाइजर नियुक्त कर दिया जाना चाहिए। जो खिलाड़ी ठीक से ना खेले, उस की सजा यह होगी कि वह मुशर्रफ साहब की लिखी हुई किताब पूरी पढ़ेगा। इस सजा को जो खिलाड़ी झेल जाये, उसे काफी सख्तजान मानकर एक दो मौके और दिये जा सकते हैं।
इसके बाद के लेवल की सजा यह होगी कि मुशर्रफ साहब की रोज लाइव स्पीच सुननी पड़ेगी, जिसमें वह अवाम के लिए रोते हुए दिखायी देंगे।
इस स्पीच को जो खिलाड़ी ठीक ठाक झेल जाये, उसके बारे में माना जाना चाहिए कि वह इत्ता सख्तजान है कि अब उस पर किसी भी सजा का असर ना होने का।

एक काम मुशर्रफ साहब के लिए यह भी हो सकता है कि भारत की राष्ट्रीय किडनैपर्स एसोसियेशन उन्हे अपना सलाहकार घोषित कर दे। किडनैपर लोग बताते हैं कि एक किडनैप्ड बंदे को चार पांच दिन भी रखना भारी हो जाता है। मुशर्रफ साहब पूरे मुल्क को ही नौ सालों तक किडनैप्ड किये रहे, कईसे, अपने अनुभव वह किडनैपरों से शेयर कर सकते हैं।

वैसे मुशर्रफ साहबजी की जगह भारतीय टेलीविजन के तमाम सीरियलों में भी हो सकती है, जो तीन चार सालों से ज्यादा स्टोरी खींचने में ही हांफ जाते हैं। मुशर्रफ साहब तो तमाम तरह की स्टोरियां बताकर बहुत मजे से नौ साल खींच गये।
कलंदर का कमाल, काली पुलिया के प्रेत के करिश्मे का कमाल रहे नौ साल, अगर मुशर्रफ साहब यह बताने लगें, तो फिर तो कई टीवी चैनल उन्हे परमानेंट एडवाइजर बना लेंगे।
नहीं क्या।

सी डी की ए बी

क्लास में ड्यूटी लगा दी गयी की बच्चों को सी डी की ए बी सी डी बतायी जाये, सो साहब शुरु हुआ।
बच्चो सीडी के बारे में क्या जानते हो-मैंने शुरुआत की।
प्रियंका चोपड़ा जी की सीडी होती है, राखी सावंतजी की सीडी होती है। कलियों का चमन बनता है- गाने की भी सीडी होती है, , जिसमें काम करने वाले बहुत कम कपड़े पहनते हैं या पहनती हैं। सरकार बनाने और गिराने की सीडी भी होती है, इसमें काम करने वाले यूं तो पूरे कपड़े पहनते हैं, फिर पता नहीं क्यों लगता है कि वो कपड़े बगैर ही स्क्रीन पर आ रहे हैं-एक बच्चे ने बताया।

शटअप, कलियों के चमन और सरकार का कंपेरीजन मत करो, बी सीरियस-मैंने डांटा।
राइट, कोई कंपेरीजन नहीं हो सकता है, कलियों का चमन एकैदम साफ सुथरा होता है। कोई कली दूसरी कली पर आरोप नहीं लगाती है, हमसे पैसे लेकर उधर दूसरी तरफ भाग ली-दूसरे बच्चे ने क्लेरिफिकेशन दिया।

ओफ्फो, तुम समझ नहीं रहे हो, लोकतंत्र में सीडी के कई आयाम होते हैं। बच्चो बताओ, सीडी देखकर तुम्हे क्या समझ में आता है-मैंने बच्चों को नये सिरे से समझाने की कोशिश की।
सर यही समझ में आता है कि सीडी बहुत बोरिंग होती है। आप बताइए घंटों घंटों सिर्फ नोटों के लेन देन को कोई कैसे देखे। सीडी में कुछ इंटरेस्टिंग एलीमेंट्स डाले जाने चाहिए। जैसे इस पार्टी का बंदा नोट लेकर उस पार्टी में जा रहा हो, तो पीछे से वह गाना बजना चाहिए-हे जोनी गद्दार. आज नकद और कल उधार, हे जोनी गद्दार, सब चलता है खेल में, हे जोनी गद्दार लग जा तू भी सेल में। जोनी……………। एकदम सस्पेंस का सीन हो जायेगा। पब्लिक देख लेगी, पांच दस मिनट। अभी तो ये सीडी बहुत बोरिंग होती हैं-एक बच्चे ने पूरी गंभीरता से बताया।

शटअप, ये किस तरह की बातें कर रहे हो। तुम सीडी के सारे पक्ष समझने की कोशिश करो-मैंने जोर से डांटा।
जी बिलकुल सही कह रहे हैं। सारे पक्ष नहीं समझ रहे हैं बच्चे। सरजी हम सीडी में नाट्य रुपांतरण डाल सकते हैं इस लेन देन को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए। मसलन शक्ति कपूरजी, गुलशन ग्रोवरजी को दिखा सकते हैं, नोटों का लेन देन करते हुए। पीछे से प्रियंका चोपड़ाजी गाना गा रही हों, अरे दीवानों मुझे पहचानो, मैं हूं डान। सर अब तक की सारी सीडियों में दिक्कत यह है कि लेडीज लोग का रोल नहीं दिखाया गया है। थर्टी परसेंट की डिमांड तो संसद में रिजर्वेशन को लेकर है। सीडी में प्रियंका चोपड़ा का नाट्य रुपांतरण दिखाया जाना चाहिए-एक बच्चा सीडी के और नये आयाम लेकर सामने आ गया है।

ये तुम क्या नयी नयी बातें लेकर आ रहे हो-मैंने अबकी बार बहुत ही जोर से डांटा।
यस सर आप सही कह रहे हैं-एक छात्र उठा, यह पुरानी फिल्मी गीतों का प्रेमी था।

वह बोला-सर हमें पुराने गीतों को भी सीडी में जगह देनी चाहिए। वह वाला गीत भी इसमें डालिये, तेरा पीछा ना छोड़ूंगा, भेज दे चाहे जेल में।
तुम तो सारे फिल्मों लोगों को, विलेनों को ही पालिटिक्स में डालने पर आमादा हो। ये क्या हो रहा है-मैंने बच्चों से पूछा।

जी शक्ति कपूर, गुलशन ग्रोवर टाइप सारे पालिटिक्स में आने को तैयार हैं। कह रहे हैं कि उठाईगिरी, चोरी, डकैती, अपहरण करके भी एक झटके में पच्चीस करोड़ नहीं मिलते, यहां मिल जाते हैं-बच्चा जवाब दे रहा है।
बच्चो तुम सीडी की बात समझ नहीं पा रहे हो-मैंने निराश होकर कहा।

सर आप सीडी की बातें समझा ही कहां पा रहे हैं-सारे बच्चों ने एक साथ मिलकर कहा
वैसे मुझे लगता है कि शायद बच्चे सही कह रहे हैं।

संडे यूं ही-समस्या सिर्फ पैसा नहीं है

वैधानिक चेतावनी-यह व्यंग्य नहीं है
जिस ओलंपिक में अमेरिका का एक खिलाड़ी ही आठ स्वर्ण पदक ले गया हो, उस ओलंपिक में भारतीयों के एक स्वर्ण, दो कांस्य पदक जीतने पर जबरदस्त खुशी का माहौल है। विकट कंगाली के बाद मिली एक रोटी भी जैसे नियामत लगती है, वैसे ही ये पदक हैं। ये पदक और उन पर व्यक्त की जा रही खुशियां दरअसल हमारी बदहाली के स्तर को बयान करते हैं कि किस कदर वंचित और पिटे हुए हैं हम कि ओलंपिक में कि कोई भी कुछ भी करता दिखता है, उससे बहुत उम्मीदें बंध जाती है।

शूटिंग में अभिनव बिंद्रा, पहलवानी में सुशील कुमार और बाक्सिंग में विजेंदर की जीत दरअसल व्यक्तिगत प्रयासों की जीत है। जिस स्तर का कमिटमेंट इन लोगों ने दिखाया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि ये विश्व के किसी भी हिस्से में होते, बेहतरीन ही करते। इनकी जीत में भारत की सरकारी या गैर सरकारी खेल संस्थाओं का कोई योगदान नहीं है। इनकी उपलब्धियों को सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धियों के तौर पर चिन्हित किया जाना चाहिए। हाल यह था कि सुशील पहलवान के पास मालिश करने के लिए भी कोई उपलब्ध नहीं था। भिवानी के जिस बाक्सिंग क्लब से कई बाक्सर ओलंपिक पहुंचे, वहां पीने के पानी का जुगाड़ तक कायदे से नहीं है।

भारतीय खेल प्रशासन अगर इन विजयों का किंचित श्रेय भी ले रहा है, तो इसे सिर्फ बेईमानी कहा जाना चाहिए। जिन असुविधाओं से जूझकर भारतीय बाक्सरों और सुशील पहलवान ने अपने मुकाबले लड़े हैं, उनसे यह तो साफ हो जाता है कि पैसा दरअसल समस्या नहीं है, समस्या है सही खेल प्रबंधन। भिवानी के बाक्सिंग क्लब में पानी, खाने के जुगाड़ के लिए अरबों रुपये नहीं लगेंगे।

पर गौर की बात यह है कि देश में अरबों रुपया खेलों के नाम पर खर्च हो रहा है।
आश्चर्यजनक पर सत्य कोटि का तथ्य यह है कि खेल मंत्रालय को 2008-09 के लिए 1112 करोड़ रुपये की राशि बजट से दी गयी है। इससे पहले के साल में दी गयी रकम के मुकाबले यह रकम 331 करोड़ रुपये ज्यादा है।
अरबों रुपये कहां जा रहे हैं, पता नहीं। खेलों में हम कहां जा रहे हैं, सबको पता है।

स्थिति यह है कि अधिकांश खेलों में ओलंपिक में हमारे खिलाड़ी क्वालिफाइंग राउंड के पार भी नहीं जा पा रहे हैं। समस्या सिर्फ पैसा नहीं है। प्रबंधन ज्यादा बड़ी समस्या है। फुटबाल, हाकी, स्विमिंग सरकारी तंत्र में कुछ फाइलों से ज्यादा नहीं है। भारत में सरकारी प्रयासों का भगवान भी मालिक नहीं है। चीन ने हालांकि मोटे तौर पर सरकारी तंत्र के जरिये ही खेल में बेहतरीन सफलता पायी है। पर चीन में कई मामलों में जिम्मेदारी तय करने का तंत्र बहुत मजबूत है। वहां परिणाम ना देने पर,भ्रष्टाचार के मामले सामने आने पर गोली से उडाये जाने का प्रावधान है। भारत में इस किस्म के कदमों की सोची भी नहीं जा सकती है। ओलंपिक या किसी भी खेल के लिए बेहतर रिजल्ट के लिए बेहतर प्रबंधन की दरकार है, जो निश्चय ही निजी प्रयासों या निजी क्षेत्र के जरिये संभव है।

निजी प्रयासों के रिजल्ट पहले आये हैं।
एमआरएफ पेस फाऊंडेशन ने इरफान पठान, मुनफ पटेल और श्री संत जैसे तेज गेंदबाज दिये हैं।
अपोलो टायर्स कंपनी करीब सौ करोड़ रुपये टेनिस में निवेश करने जा रही है। जे के टायर्स ने मोटर रेसिंग में रकम लगायी है। रेसिंग में जो भारतीय नाम दिखायी पड़ रहे हैं, उनके पीछे इस रकम का का रोल है। भारती समूह में ने फुटबाल में दिलचस्पी ली है, हो सकता है कि दस पंद्रह सालों बाद फुटबाल के क्षेत्र में भारतीय कुछ नाम करें।

पर ये सारे प्रयास एक तरह से छितरे बिखरे हैं। और इनके पीछे या किसी एक उद्योगपति की निजी पसंद है या फिर खेल में रकम लगातार पब्लिसिटी माइलेज लेने की मंशा। यूं यह तो साफ है कि उद्योगपति जिस भी क्षेत्र में रकम लगायेंगे, उससे कुछ हासिल करने की इच्छा करेंगे। पर सवाल यह है कि क्या कुछ ऐसा संस्थागत प्रयास संभव है, जिसके तहत सब खेलों की सही व्यवस्था हो सके। भारत में क्रिकेट के लिए धन कोई समस्या नही है। आईपीएल के बाद तो क्रिकेट के लिए समस्या धन नहीं है, बल्कि धन का आधिक्य समस्या है। बाकी खेलों के लिए दिक्कत है।

मोटे तौर पर जिस खेल को टीवी पर विजुअली इंटरेस्टिंग नही बनाया जा सकता है, उसके लिए कारोबारी स्पांसर तलाशना मुश्किल है। उदाहरण के लिए शतरंज में विश्वनाथन की उपलब्धियां असाधारण हैं, पर शतरंज टीवी पर दिखाना और उसे देखना खासा बोरिंग काम है। एक्शन रहित गेम को स्पांसर मिलना मुश्किल है।

पहलवानी को कोई सेठ साहब या नेताजी स्पांसरशिप दे दें, तो ठीक है, वरना यह खेल भी स्पांसरों के लिए तरसता है और यह बिलकुल ना सोचा जाये कि सुशील के कांस्य पदक जीतने के बाद इस खेल के वित्तीय दिक्कतें कम हो जायेंगी। पहलवानी चूंकि ग्रामीण भारत की पसंद का खेल है, अमीर और मध्यवर्गीय शहरी इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायेगा, तो इसे स्पांसर मिलना मुश्किल ही बना रहेगा। पहलवानी के लिए दिक्कतें उतनी ही बनी रहेंगी। डब्लू डब्लू डब्लू एफ टाइप पहलवानी आधारित मनोरंजन को तो स्पांसर मिल सकते हैं, पर पहलवानी को बतौर गेम अभी भी बहुत दिक्कतें झेलनी हैं।

कमोबेश यही हाल बाक्सिंग का है, बाक्सिंग की पैकेजिंग ठीक तरह से की जाये, इसकी मार्केटिंग ठीक तरीके से की जाये, इस एक्शन बेस्ड गेम को स्पांसर मिल सकते हैं। पर इस सबके लिए एक संस्थागत सोच और तैयारियां जरुरी हैं। एक ओलंपिक अकादमी क्यों नहीं बनायी जा सकती, जो तीरंदाजी, बैडमिंटन, बाक्सिंग, फुटबाल, हाकी, टेनिस, शूटिंग, पहलवानी और तैराकी को लगातार प्रोफेशनल तरीके से प्रश्रय दे। निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां इसमें अपना कंट्रीब्यूशन दें। जिम्मेदार प्रबंधन के मानक यहां लागू किये जायें।

देश की बड़ी कंपनियों के लिए यह मुश्किल काम नहीं है। मार्च, 2008 में खत्म हुई वित्तीय वर्ष में देश की निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस का शुद्ध मुनाफा 19.458 करोड़ रुपये था। इस मुनाफे के सिर्फ दशमलव एक प्रतिशत यानी करीब बीस करोड़ से बाक्सिंग की तस्वीर बदल सकती है। एक प्रतिशत यानी करीब 194 करोड़ रुपये से तो बहुत खेलों की तस्वीर बदल सकती है। देश की शीर्ष सौ कंपनियां अगर ओलंपिक अकादमी में रुचि लें, और इसकी व्यवस्था अपने हाथ में लें ले, तो दो ओलंपिक के बाद भारतीयों को खुश होने के ज्यादा मौके मिल सकते हैं।

पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या यह संभव है।
व्यक्तिगत हितों के लिए काम करना हो, तो भारतीय श्रेष्ठ काम करते हैं, पर सामूहिक, राष्ट्रीय हित में काम करने का भारतीय रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं है।
पुराने रिकार्ड बदलें, इस समय तो सिवाय इस शुभेच्छा के कुछ नहीं किया जा सकता है।