अबे मोबाइल है कि नेता
तरह-तरह के आइटम आ लिये हैं, साहब। मोबाइल फोन में टीवी, वीडियो, इंटरनेट, फास्ट डाटा ट्रांसफर, ना जाने क्या। कीमत सिर्फ सत्तर हजार रुपये।
हर आइटम को अलग अलग रहने दिया जाये। टीवी टीवी रहे, फोन फोन। पर ऐसा हो कहां पा रहा है जी, कोई क्या है, समझ में कहां आता है। जो इधर हमारी हेल्थ के लिए, हमारी फैमिली के लिए बहुत चिंतित दिखता है, वह इंश्योरेंस का एजेंट सेल्समैन निकलता है। फोन पर चहकती हुई बालिका जो मुझे बर्थ डे की शुभकामना देती है, अगली ही सांस में बताती है कि आप बूढ़े हो रहे हैं, आपके लिए नया इंश्योरेंस प्लान यह है।
जिसे जो समझो ,वह वह नहीं है। जो काम जहां होना चाहिए, वहां नहीं होता।
बंदा घर में होम थियेटर लगाकर फिल्म देखता है, और सिनेमा हाल के माल में खाना खाने जाता है। तरह तरह के संयंत्र, दवाईयों से घर को अस्पताल बनाकर रखता है और फाइव स्टार प्राइवेट अस्पतालों के नीचे बने रेस्त्रां में खाना खाने जाता है। दिल्ली के एक टाप अस्पताल के रेस्त्रां की चाट बहुत फेमस है। इलाज के मामले में यह अस्पताल अभी ज्यादा नाम नहीं कमा पाया है। अब बंदा घर में वीरानी, तूरानी, और ना जाने किन किन फैमिलियों के मसलों पर चिंतित होता है। और बीबी दफ्तर में भी मोबाइल पर बात करना चाहे, तो कह देता है कि अभी घरेलू मसलों के लिए टाइम नहीं है।
जो आइटम जहां का है, वहां नहीं है। पता नहीं कहां कहां है।
लेटेस्ट मोबाइल का सेल्समैन बता रहा है कि इस मोबाइल के जरिये आप एकदम फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन भेज सकते हैं। आपको फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन मिल सकती है।
अब फास्ट इनफोर्मेशन मिल भी जाये, तो क्या फर्क पड़ता है।
आलू बीस प्रतिशत महंगे हो गये। यह इनफोर्मेशन अभी मिल जाये, या कल सुबह मिल जाये, क्या फर्क पड़ता है। बल्कि कल सुबह ही मिले, तो बेहतर, एक रात की नींद गायब तो नहीं होगी। और जिन इनफोर्मेशनों के लिए दिल बेकरार रहता है, वो अब कहीं से नहीं आती। मसलन चावल पांच रुपये किलो कहां मिल सकते हैं, कोई नहीं बताता। आलू दो रुपये किलो कहां बिकते हैं, यह इनफोर्मेशन कहीं से नहीं आती।
अबे फास्टम फास्ट इनफोर्मेशन का क्या करेंगे, आलू टमाटर सस्ते होने की इनफोर्मेशन ला ना।
सरजी वो इनफोर्मेशन हमारे पास भी नहीं है-मोबाइल का सेल्समैन बता रहा है।
तब क्या खाक टेकनोलोजी डेवलप हुई है।
ऐसा मिक्सममिक्स कर दिया है कि समझ नहीं आता कि आइटम है क्या। उधर से देखो, तो मोबाइल, इधऱ से देखो, तो कैमरा, उधर से देखो, वीडियो, इधर से देखो रेडियो, अबे तुझे क्या कह बुलायें। क्या है तू, असल में तुझे क्या मानें। तू टेकनीकल डिवाइज है या नेता, कुछ पक्का ही नहीं है कि तू है क्या।
इधर से देखो, तो भाजपाई लगता है, उधऱ से देखो तो कांग्रेसी लगता है। उधर से देखो, वहां भी उठक बैठक है, इधर से देखो, तो यहां भी आमदरफ्त है।
होना तो यह चाहिए कि नेताओँ का कैरेक्टर टेकनीकल डिवाइजों के लेवल पर आता, एकदम स्पेसिफिक माफिक, कोई कनफ्यूजन नहीं है। जो है, एक झटके में साफ, सामने।
पर हो गया उलटा, टेकनीकल डिवाइजों का लेवल नेताओँ के लेवल पर आ लिया है। समझ में ही नहीं आ रहा है कि असल में है क्या। एकैदम शिबू सोरेन के माफिक दिखायी पड़ रहे हैं बड़के बड़के मोबाइल कम टीवी कम कैमरा कम इंटरनेट कम जाने क्या क्या।
बल्कि मैं तो अब डर रहा हूं। मोबाइल फोन में टीवी आ गया है, क्या पता कुछ दिनों बाद किसी टीवी में मोबाइल फोन आ जाये। बड़ा कनफ्यूजन हो जायेगा, आवाज कहां से आ रही है, टीवी सीरियल से आ रही है या फोन। हो सकता है कि कुछ इस टाइप का सीन बने टीवी कम फोन में-
हलो मैं अलां नेता बोल रहा हूं।
आज रात को नौ बजे घर में घुसेगा, आपका माल पार कर लेगा।
मिलना है।
खौफ का खलीफा बचकर रहना। वह हाथ साफ कर लेता है।
वोट मुझे दीजिये।
नोट भी, जेवर भी, घऱ के सारे माल को गायब कर देता है। खौफ का राज देखिये, रात ग्यारह बजे।
देखेंगे भई, देखेंगे, अभी तो बहुत कुछ देखना लिखा है हमारी किस्मत में।
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